ये हैं वो 8 चिरंजीवी जो सदा के लिए हैं अमर

सनातन संस्कृति में किसी भी पूजा के वक्त एक श्लोक बोला जाता है- वह है अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमानश्च विभीषण:। कृप: परशुरामश्च सप्तएतै चिरजीविन:॥ सप्तैतान् संस्मरेन्नित्यं मार्कण्डेयमथाष्टमम्। जीवेद्वर्षशतं सोपि सर्वव्याधिविवर्जित।। इस श्लोक की पहली दो लाइनों का अर्थ यह है कि अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य और परशुराम ये सात चिरंजीवी यानी अमर हैं। इसके बाद अगली लाइन का अर्थ यह है कि इन सात के साथ ही मार्कंडेय ऋषि के नाम का जाप करने से व्यक्ति स्वस्थ रहता है और उसे लंबी आयु मिलती है। श्लोक के अनुसार सात अमर लोगों में पहला नाम है अश्वत्थामा, जो कि गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र हैं। द्वापर युग में हुए युद्ध में अश्वत्थामा ने कौरवों की ओर से युद्ध किया था। उस समय अश्वत्थामा ने ब्रह्मास्त्र छोड़ दिया था, लेकिन वह इसे वापस नहीं ले सका। इस वजह से भगवान श्रीकृष्ण ने उसे अनंतकाल तक पृथ्वी पर भटकते रहने का शाप दिया था। इस शाप ने अश्वत्थामा को अमर बना दिया। दूसरे अमर हैं राजा बलि, जो कि भक्त प्रहलाद के वंशज हैं। उन्होंने भगवान विष्णु के अवतार वामनदेव को अपना सब कुछ दान कर किया था। दान के प्रति उनकी समर्पण भावना से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु उनके द्वारपाल बन गए थे।

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इसी तरह वेद व्यास हैं, उन्होंने ऋग्वेद, अथर्ववेद, सामवेद और यजुर्वेद यानी चारों वेद का संपादन किया था। उनका पूरा नाम कृष्ण द्वैपायन है। 18 पुराणों की रचना भी उन्होंने ही की है। वेद व्यास, ऋषि पाराशर और सत्यवती के पुत्र थे।

श्रीराम भक्त हनुमान भी चिंरजीवी हैं। त्रेता युग में अंजनी और केसरी के यहां हनुमानजी का जन्म हुआ था। हनुमानजी माता सीता की खोज में लंका तक पहुंच गए। उन्होंने देवी सीता को श्रीराम का संदेश दिया था, इससे प्रसन्न होकर माता सीता ने इन्हें अजर-अमर रहने का वरदान दिया था।

लंकापति रावण के भाई विभीषण को भी अमर होने का वरदान मिला है। विभीषण ने धर्म-अधर्म के युद्ध में धर्म का साथ दिया था। उन्होंने अपने बड़े भाई रावण को बहुत समझाया था कि वह श्रीराम से बैर न करें, लेकिन अहंकार में डूबा रावण नहीं माना। बाद में रावण के अंत के बाद भगवान श्रीराम ने विभीषण को लंका सौंप दी थी।

महाभारत काल में कौरव और पांडवों के गुरु कृपाचार्य बताए गए हैं। वे परम तपस्वी ऋषि हैं। अपने तप के बल से उन्होंने भी अमर होने का वरदान प्राप्त किया है। भगवान विष्णु के दस अवतारों में से छठा अवतार परशुराम का है। उनके पिता ऋषि जमदग्नि और माता रेणुका थीं। उनका शुरुआती नाम राम था। उनके कठिन तप से प्रसन्न होकर शिवजी ने उन्हें दिव्य परशु (फरसा) भेंट किया था। इसके बाद वे परशुराम कहलाए। परशुराम का उल्लेख रामायण और महाभारत दोनों ग्रंथों में है।

इन सात चिरंजीवियों के साथ ही ऋषि मार्कंडेय का भी अमर माना जाता है। इसलिए आठवें चिरंजीवी हैं ऋषि मार्कंडेय। वे अल्पायु थे। उन्होंने महामृत्युंजय मंत्र की रचना की और तप करके शिवजी को प्रसन्न किया। इसके बाद जो मार्कंडेय कम आयु के थे, शिवजी की कृपा से चिरंजीवी हो गए। कहा तो यह भी जाता है कि जब प्रलय आती है और पूरी दुनिया डूबने लगती है तो शास्त्रों, औषधियों, फसलों के बीज आदि महत्वपूर्ण चीजों को लेकर ऋषि मार्कंडेय नौका में बैठ जाते हैं और प्रलयकाल खत्म होने के बाद इन्हें फिर से संसार में स्थापित करते हैं। यही कारण है कि सभी धर्म-शास्त्रों में लिखा होता है मार्कंडेय उवाच, यानी जैसा मार्कंडेय ऋषि ने कहा।