एक सर्प जो कर्ण के ज़रिये लेना चाहता था अर्जुन की जान, पर कर्ण नहीं हुए तैयार

महाभारत का युद्ध धरती पर धर्म की स्थापना के लिए हुआ था. लेकिन इस युद्ध में कई ऐसी घटनाएं हुईं, जिनकी कहानियां आज भी बहुत प्रेरणादायक हैं. बुराई का साथ देने वाला भी उतना ही गलत होता है, जितना बुराई कने वाला, पर उनकी कुछ अच्छाइयां हमेशा याद रह जाती हैं. ऐसी ही एक कहानी के अनुसार अश्वसेन एक सर्प था, और नागाधिराज तक्षक के कुल से था जो अपने परिवार के साथ खांडवप्रस्थ में रहता था. अपने अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने भी उसी जंगल में अपना समय गुज़ारा. एक घटना के दौरान श्री कृष्ण के कहने पर अर्जुन ने अपने बाण चला कर आग प्रज्जवलित की उस जंगल में आग लगा दी. और उस भयंकर आग में सभी नाग मारे गए. उन नागों में अश्वसेन का परिवार भी था, जिसमें से केवल अश्वसेन ही जीवित बचा था.

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अश्वसेन बदला लेने की नीयत से तभी से अर्जुन के पीछे पड़ा था. अर्जुन के प्रतिद्वंदी कर्ण थे, और जब उनमें युद्ध चल रहा था तो कर्ण ने नागास्त्र चलाया, जब भी कभी दैवीय अस्त्र चलाए जाते हैं तो सम्बन्धित शक्ति का आगमन उस कार्य का संपन्न करने हेतु होता है. तो नागास्त्र के लिए जब नागों का आह्वान किया गया तो यहां नव नागों में से किसी एक शक्ति का आगमन होना निश्चित था. अश्वसेन यह सुन कर अपना बदला पूरा करने की मंशा से कर्ण के बाण से लिपटकर अर्जुन की तरफ बढ़ चला, जब श्री कृष्ण ने नागास्त्र को अर्जुन की ओर आते देखा तो उन्होंने अर्जुन से नीचे झुकने कहा और पैर के अंगूठे से दबा कर रथ में लगे घोड़ों को नीचे झुकने का इशारा किया. नागास्त्र सरसराते हुए अर्जुन के मुकुट से आकर लगा और मुकुट वह विष के प्रभाव से जल गया. उसके बाद अश्वसेन दोबारा कर्ण के पास गया और उससे कहा कि वह दोबारा नागास्त्र का आव्हान करे जिससे वह अर्जुन का प्राण ले सके, किंतु कर्ण ने कहा कि जब एक बार अस्त्र विफल हो गया तो वह अर्जुन पर दूसरा अस्त्र चलाएगा, और किसी भी तरह के छल से इनकार कर दिया. और आगे के युद्ध में अर्जुन ने अश्वसेन का अंत कर दिया.