चारों वेदों के हैं एक-एक उपवेद

सनातन धर्म में जैसे चारों वेदों की महत्ता और मान्यता है वैसे ही इन चारों वेदों के एक-एक उपवेद की भी मान्यता है। चूँकि वेदों का विषय बहुत ही विस्तृत है और वेदों की भाषा बहुत ही कठिन है यहाँ तक कि वेदों को ठीक से पढ़ने के लिए भी नियम शास्त्र बनाए गए हैं। संभवतः इसीलिए हमारे पूर्वज ऋषि-मुनियों ने चारों वेदों के कुछ महत्वपूर्ण भागों को अलग से संग्रहीत करके चार उपग्रंथों की रचना की और उन्हें ‘उपवेद’ नाम दिया। इन उपवेदों का परिचय इस प्रकार है–

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ऋग्वेद का – शिल्प/स्थापत्य वेद
यजुर्वेद का – धनुर्वेद –
सामवेद का – गंधर्व वेद
अथर्ववेद का – आयुर्वेद

शिल्पवेद अथवा स्थापत्यवेद, ऋग्वेद का उपवेद है। अधिकांश विद्वानों और शोधकर्ताओं का मत यही है परंतु कुछ विद्वान इसको अथर्ववेद का उपवेद मानते हैं। इस उपवेद की रचना विश्वकर्मा जी ने की है और स्थापत्य अथवा शिल्प का विश्वकर्मा से संबंध तार्किक भी है। इस उपवेद में भवन अथवा पिण्ड निर्माण से संबंधित ज्ञान का विस्तृत संकलन है।

धनुर्वेद के लिए मान्यता है कि इस उपवेद को महर्षि विश्वामित्र जी ने यजुर्वेद से निकालकर एक अलग ग्रंथ के रूप में साकार किया। इस उपवेद में चार पाद (भाग) हैं- दीक्षा पाद, संग्रह पाद, सिद्धि पाद तथा प्रयोग पाद। मधुसूदन सरस्वती जी के ग्रंथ ‘प्रस्थान भेद’ के अनुसार धनुर्वेद में अस्त्र शस्त्रों के ग्रहण करने उनका प्रशिक्षण, अभ्यास, तथा प्रयोग का सांगोपांग वर्णन है। ‘कोदंड मण्डन’ धनुर्विद्या का वर्तमान में बहुत ही प्रामाणिक ग्रंथ माना जाता है।

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गंधर्व वेद या संगीत वेद- सामवेद के इस उपवेद के रचनाकार हैं भरत मुनि। इस उपवेद में सामवेद के संगीत से जुड़े महत्वपूर्ण अंशों का संकलन है जिसमें नृत्य, गीत, वाद्य यंत्रों के सिद्धांत एवं प्रयोग, ग्रहण तथा प्रदर्शन का सविस्तार वर्णन है। भरत मुनि ने अपने नाट्य शास्त्र में नाटक के साथ-साथ संगीत का भी बहुत प्रामाणिक और व्यवहारिक वर्णन किया है। इस विषय (संगीत) पर कोहल ने भी एक महाग्रंथ लिखा है परन्तु इसका मात्र एक भाग ‘तालाध्याय’ ही वर्तमान में उपलब्ध है।
मातंक द्वारा रचित ‘बृहद्देशी’ ,
नारद द्वारा रचित ‘संगीत मकरंद’
सारंगदेव द्वारा रचित ‘संगीत रत्नाकर’ आदि ग्रंथों के कारण यह उपवेद बहुत समृद्ध है।

आयुर्वेद उपवेदों में एक बहुत ही प्रमुख उपवेद है। महर्षि सुश्रुत सहित अधिकांश विद्वानों का मत है कि यह अथर्ववेद का ही अंश है परंतु मधुसूदन सरस्वती जी के ‘प्रस्थान भेद’ ग्रंथ के अनुसार और कुछ अन्य विद्वानों के अनुसार आयुर्वेद, ऋग्वेद का उपवेद है।

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आयुर्वेद के आठ स्थान माने जाते हैं – सूत्र, शारीरिक, ऐन्द्रिक, चिकित्सा, निदान, विमान, विकल्प तथा सिद्धि। इसी विषय पर महर्षि चरक द्वारा संग्रहीत एक ग्रंथ है जिसे ‘चरक संहिता’ कहते हैं। ‘चरक संहिता’ आयुर्वेद विज्ञान में अपना एक महत्वपूर्ण स्थान रखने वाला ग्रंथ है। चरक, सुश्रुत तथा वाग्भट ये आयुर्वेद के ‘त्रिमुनि’ माने जाते हैं। इनके अतिरिक्त अर्थशास्त्र को भी विद्वानों द्वारा उपवेद का ही स्थान दिया गया है और इसकी उत्पत्ति भी अथर्ववेद से ही मानी जाती है।

राजनीति और दंड नीति इसी अर्थशास्त्र के अंतर्गत माने जाते हैं। अर्थशास्त्र के आचार्यों में- बृहस्पति, उशना, विशालाक्ष, भारद्वाज, पराशर आदि प्रमुख हैं। आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) का लिखा अर्थशास्त्र वर्तमान में बहुत प्रसिद्ध और सर्वमान्य है।

ॐ तत्सत