इस तरह दिया भगवान श्रीराम ने अपनी मातृभूमि को सम्मान

हर इंसान अपनी मातृभूमि से प्यार करता है. यही तो वो भावना है, जिसकी बदौलत हमारे सैनिक अपनी जान की परवाह किये बिना दिन रात सीमा पर डटे रहते हैं, जब भी कोई नौकरी या व्यवसाय के लिए अपने वतन से दूर जाता है, तो उसे हरपल अपने देश की मिट्टी की महक याद आती है.

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रामायण में भी ये बताया गया है, जब श्रीराम वनवास जाने के लिए अपने राज्य आयोध्या की सीमा से बाहर आते हैं, तो अपनी मातृभूमि को प्रणाम करके उसकी थोड़ी सी मिट्टी अपने साथ ले जाते हैं, और अपनी कुटिया में उस मिट्टी की हर रोज़ पूजा करते हैं|

हर इंसान के जीवन में अलग अलग पड़ाव होते हैं, उसे काम धंधे के सिलसिले में अपना घर परिवार भी छोड़ना पड़ता है, जहाँ हम जन्म लेते हैं, हमारा बचपन गुज़रता है, वो हमारी जन्मभूमि होती है, और जिस जगह हमारा जीवन गति लेता है, वो कर्मभूमि, और जिस राष्ट्र की छत्र छाया में हम रहते हैं, वो हमारी मातृभूमि होती है.

भगवान राम जब अयोध्या से जा रहे थे, तब बहुत भावुक थे, आखिर होते भी क्यों नहीं, 14 वर्ष का समय जीवनकाल में सात – सात वर्ष के 2 बड़े चक्र होते हैं, 14 वर्ष में एक अवस्था गुज़र जाती है. जितनी कठिनाई उन्हें अपने रिश्तों को छोड़कर जाने में हो रही थी, उतना ही शोक उनके ह्रदय में इस बात का था कि, वो अपनी मातृभूमि से दूर जा रहे हैं. और पता नहीं कब तक उन्हें अपनी मिट्टी की उस सौंधी सी महक से दूर रहना होगा, इसीलिए वो अपनी मातृभूमि की मिट्टी का एक हिस्सा अपने साथ ले गए, और जहाँ रहे वहां उन्होंने उस मिट्टी की पूजा अर्चना की. शायद ही कोई ऐसा होगा, जिसे अपनी मातृभूमि से प्यार ना हो, मातृभूमि, माँ की तरह हमेशा सबके दिलों में बसती है.

रामजी द्वारा अपनी मातृभूमि से मिट्टी का एक टुकड़ा ले जाने एक मतलब सिर्फ उसकी पूजा करना नहीं था, बल्कि जिस ज़मीन पर वो पले, बढ़े और खेले, उसकी परवाह और सम्मान देना था, इसीलिए तो रामायण के हर प्रसंग का इंसान के जीवन से सीधा सम्बन्ध है.