ऐसा क्या है उथिरामेरूर में पीएम मोदी ने भी किया जिसका सार्वजनिक रूप से ज़िक्र

हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नए संसद भवन का शिलान्यास किया है. अनुमान लगाया जा रहा है कि 2022 तक यह संसद भवन बनकर तैयार हो जाएगा. संसद भवन के भूमिपूजन के दौरान हमारे माननीय प्रधानमंत्री जी ने उथिरामेरूर का उल्लेख किया था. उथिरामेरूर चेन्नई से लगभग 90 किलोमीटर दूर कांचीपुरम जिले में स्थित है. जानकारी के अनुसार, राजा चोल (985-1014 ए डी), उनके पुत्र राजेंद्र चोल और विजयनगर सम्राट कृष्णदेव राय के शासनकाल में यहां के तीनों बड़े मंदिरों में बड़ी संख्या में शिलालेख तैयार किए थे . इन शिलालेखों के अनुसार, वहाँ 1,250 साल का इतिहास है. परांतका चोल साम्राज्य [907-955 A.D.] की अवधि के दौरान गाँव प्रशासन को चुनाव के माध्यम से एक आदर्श प्रणाली के रूप में सम्मानित किया गया था.

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तमिलनाडु के कई मंदिरों की दीवारों पर जिन शिलालेखों को देखा जा सकता है, वे सभी ग्राम सभाओं को संदर्भित करती हैं. तमिलनाडु के पुरातत्व विभाग से आर शिवानंदम जी का कहना है कि उथिरामेरूर शिलालेख को मंदिरों की दीवारों पर देखा जा सकता है. इससे यह पता लगाया जा सकता है कि निर्वाचित ग्राम सभा कैसे कार्य करती थी.

इस ऐतिहासिक तथ्य की गवाही 1100 साल पहले इस प्रकार दी गई थी “ एक गांव में एक विस्तृत और अत्यधिक परिष्कृत चुनावी प्रणाली थी और यहां तक कि चुनाव के समय इस विधा को लिखने वाला एक लिखित संविधान भी था. ऐच्छिक ग्राम प्रजातंत्र की इस प्रणाली का विवरण ग्राम सभा (ग्राम सभा मंडप) की दीवारों पर अंकित किया गया है, जो ग्रेनाइट स्लैब से बना एक आयताकार के आकार में है. “यह भारत के इतिहास में एक उत्कृष्ट दस्तावेज है. इस प्रकार के संविधान को 1,000 साल पहले उस समय काम करने वाली ग्राम सभा ने लिखा था.

इन शिलालेखों के जरिए कई महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है जैसे उस दौरान किस उम्मीदवार का किस योग्यता के आधार पर चयन किया गया, और किस उम्मीदवार को अयोग्यता के कारण किस मानदंड से निष्कासित किया गया, और चुनाव के दौरान कौन-कौन से तरीक़ों का इस्तेमाल किया जाता था और उनका प्रभाव किस तरह का था. अर्थात् चुनाव के दौरान जो भी गतिविधियां हुई उन पर विस्तृत जानकारी इन शिलालेखों के माध्यम से पता चलती हैं.

मुख्य विशेषताएं क्या थीं?
गाँव को 30 वार्डों में विभाजित किया गया था, जिसमें प्रत्येक के लिए एक प्रतिनिधि को चुना गया था. जो लोग चुनाव लड़ने के इच्छुक होते उनकी आयु 35 वर्ष से अधिक और 70 वर्ष से कम होना अनिवार्य था. केवल वे लोग जो भूमि स्वामी होते थे और उचित कर देते थे, उनको ही चुनाव लड़ने का अधिकार था. ऐसे भूमि स्वामियों के पास कानूनी रूप से स्वामित्व वाली साइट पर निर्मित घर होना ज़रूरी था, (पब्लिक पोम्बोकॉक पर नहीं). समितियों में से किसी भी सेवा पद पर रहने वाला व्यक्ति अगले तीन कार्यकाल तक दोबारा चुनाव नहीं लड़ सकता था. प्रत्येक कार्यकाल एक वर्ष का होता है. निर्वाचित सदस्य जिन्होंने रिश्वत ली हो, संपत्ति की हेराफेरी की हो, अनाचार किया हो, या सार्वजनिक हित के खिलाफ काम किया, उन्हें अयोग्यता का सामना करना पड़ता था. चुनाव होने पर शिशुओं सहित पूरे गाँव को ग्राम सभा मंडप में उपस्थित होना पड़ता था. केवल बीमार और तीर्थ यात्रियों को ही छूट दी जाती थी.

ऊपर जितनी भी बातें बताई गई हैं यह किसी स्कूल व कॉलेज के इतिहास की किताबों से नहीं हैं, बल्कि परमाचार्य की एक किताब में लिखी हुईं हैं. जानकारी के अनुसार जब टी. एन. शेषन पूर्व चुनाव आयुक्त को मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में नियुक्त किया गया था तब वे थोड़े निराश हो गए थे.

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टी.एन शेषन ने 97 वर्षीय परमाचार्य से मुलाकात की. परमाचार्य ने उनकी उदासी को भांप लिया और उनके आत्मविश्वास को बढ़ाया और कहा कि ईश्वर ने उन्हें भारतीय जनता की सेवा के लिए चुना है तो इस मौके को अच्छे से इस्तेमाल करना चाहिए.

साथ ही उन्होंने टी.एन शेषन को सुझाव दिया कि शेषन उथिरामेरूर मंदिर में जाएँ और 1000 साल पहले प्रचलित चुनावी नियमों के विवरणों को ध्यान से पढ़ें, यहां पर चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों की योग्यता को दर्शाया गया है.

शेषन का कहना है कि oral चुनावी सुधारों का श्रेय कांची महास्वामी को जाना चाहिए. साथ ही वे कहते हैं कि यह सब कुछ 97 वर्षीय परमाचार्य के बिना संभव नहीं हो पाता. जिन्होंने उथिरामेरूर मंदिर से जुड़ी हर जानकारी विस्तार से बताई और कहा कि 10 प्रतीशत भी अगर मंदिर की बातों को अपना लिया तो देश को बहुत फायदा हो जाएगा.

कंलमीनिष्ट टीजेएस जॉर्ज के अनुसार, शेषन ने अपने कार्यकाल में सुनिशिचत किया कि देश की डिमोक्रसी को किसी भी प्रकार की दिक्कते न हो. नए संसद भवन के शिलांन्यास के दौरान पीएम मोदी ने उथिरामेरूर मंदिर की चर्चा कर लोगों में इसके प्रति उत्सुक्ता पैदा की.