चरम पे है भीषण संग्राम

कुंभकरण के मारे जाने पर रावण भी बहुत दुखी और आश्चर्यचकित होता है,विभीषण भी बहुत दुखी होते हैं। रावण अधर्म और पाप के रास्ते पर चलता हुआ अपने अहंकार का मारा अपने बेटे अतिकाय, त्रिशिरा,नरान्तक,देवांतक जैसे महाविकट राक्षसों को मोर्चा संभालने का आदेश देता है,

वहीं विभीषण पिता समान अपने भाई कुंभकरण की मृत्यु पर दुखी होते हैं और पश्चाताप करते हुए कहते हैं
‘मैं स्वयं ही अपने भाई की मृत्यु का कारण बन गया।’

विभीषण को दुखी देखकर रामजी कहते हैं-कोई किसी की मृत्यु का कारण नहीं होता। काल स्वयं मृत्यु का कारण बना लेता है। कौन सी ऐसी डाली है जिस पर फूल खिला, फला और डाल से नहीं गिरा ? कौन सी जीवन ज्योति ऐसी है जो प्रज्वलित हुई और बुझी नहीं? ये विधि का विधान है कि धरातल पर स्थित चल अचल सब का अंत एक ना एक दिन अवश्य होना है। इसलिए ज्ञानी को मरने वालों का शोक नहीं करना चाहिए।

आत्मा की मृत्यु नहीं होती केवल शरीर का अंत होता है।संसार में कई प्रकार के शरीर हैं , अपने कर्मानुसार प्रत्येक जीव एक शरीर त्याग कर दूसरा धारण करता है।*

राम जी के वचनों को सुनकर विभीषण का संकोच और पछतावा समाप्त होता है।
******

Jai Shriram 🙏

Gepostet von Arun Govil am Samstag, 23. Mai 2020

 

धर्म का अधर्म से
सत्य का असत्य से
न्याय का अन्याय से
नीति का अनीति से

संग्राम भीषण से भीषणतर होता जा रहा है और धीरे धीरे रावण के एक से बढ़कर एक योद्धा मारे जा रहे हैं। कुम्भ, निकुम्भ, अकम्पन, त्रिशिरा, आदि मारे गए। लक्ष्मण के हाथों रावण के पुत्र अतिकाय का ब्रह्मास्त्र द्वारा संहार हुआ।
****

आज हम मिसाइलों और लेजर गाइडेड बमों की बात करते हैं और आधुनिक विज्ञान की बहुत बड़ी उपलब्धि समझते हैं परंतु ध्यान से देखा जाए तो आज के दौर से भी भयानक विनाशक मिसाइल और हथियार आज से हजारों हजार साल पहले हमारे देश में विकसित हो चुके थे और उनका प्रयोग भी हुआ है।
*****
रामायण का न कोई पात्र काल्पनिक है, ना घटना काल्पनिक है और ना ही उस समय के कोई अस्त्र-शस्त्र काल्पनिक हैं।

रामायण हमारे देश का, इस धरती का, सनातन धर्म का एक प्रमाणित दस्तावेज है, अक्षरस: सत्य इतिहास है।

*****

 

इस भीषण युद्ध को देखकर विभीषण बड़े दुखी होते हैं और राम जी से कहते हैं कि प्रभु युद्ध का परिणाम कितना भयानक होता है? लड़ने वालों के साथ-साथ उनकी संस्कृतियाँ भी समाप्त हो जाती हैं।

राम जी कहते हैं -हां महाराज विभीषण यह बहुत बड़ी विडंबना है कि सदैव धर्म की शक्तियों को अधर्म की शक्तियों के विरुद्ध शांति की स्थापना के लिए युद्ध करना पड़ता है।

सत्य तो यह है कि मानव का सबसे बड़ा शत्रु स्वयं युद्ध है। मानव संस्कृति की संपूर्ण विजय तब होगी जब संसार में सत्य और न्याय की विजय के लिए मानव को युद्ध की आवश्यकता ही नहीं होगी।

रामायण की ये बातें, राम जी के ये विचार सारे संसार के लिए कितने उपयोगी हैं ये बड़ी आसानी से समझा जा सकता है।
*****