पीछे छूटती जा रही है संयुक्त परिवार की परिभाषा 

जिंदगी में इंसान की दौड़ बढ़ गई है. सबने अपने अपने हिसाब से अपने जीवन की प्राथमिकताएं तय करके रखीं हैंह. किसी को बहुत बड़ा आदमी बनना है, किसी को ऑफिस का मैनेजमेंट हमेशा बनाये रखना है. कीस को कॉम्पटीशन में बहुत आगे निकलना है. बस इन सबके बीच कुछ पीछे छूट रहा है तो वो हैं रिश्ते. समय की कमी इसका सबसे बड़ा कारण है. और जो थोड़ा बहुत समय मिलता भी है, उसे लोग गेजेट्स के साथ निकाल देते हैं. मोबाइल, कंप्यूटर, टीवी, इन सबके साथ व्यस्त इंसान को अपने आस पास के बिखरते हुए रिश्ते भी नज़र नहीं आते हैं.

रिश्तों में बढ़ती हुई दूरियों की एक वजह ये भी है, कि आजकल लोग संयुक्त परिवार की परिभाषा ही भूल गए हैं. काफी सारीं चीज़ें समय के हिसाब से भी बदल जातीं हैं. अब अगर किसी को काम धंधे के सिलसिले में या नौकरी के चलते अपनी जन्मभूमि से दूर जाना होता है, तो संयुक्त परिवार तो वहीँ से पीछे छूट जाते हैं.

  1. संयुक्त परिवार में हमारे बड़े बुजुर्ग सबसे बात करते थे. पर अब महानगर की जीवनशैली में बुजुर्ग कहीं और होते हैं, और दो कमरों के छोटे से घर में रहने बाद भी परिवार के सदस्य एक दूसरे बहुत दूर होते जा रहे हैं.

रिश्तों को समय देना बहुत ज़रूरी होता है. और उनके साथ तालमेल बिठाकर चलना चाहिए. जिस तरह से भगवान राम और उनके परिवार के आपस में रिश्ते थे, और प्रभु राम अपने माता पिता की आज्ञानुसार ही कार्य करते थे, वो एक ऐसा उदाहरण है, जो पूरे समाज को जोड़कर रखता है. प्रभु राम के अपने भाइयों के साथ जितने मधुर सम्बन्ध थे, जिसके चलते उनके साथ उनके छोटे भाई लक्ष्मण सब कुछ छोड़कर वन में चले गए, और हर परिस्थिति में साथ रहे. ऐसे ही उनके भाई भरत ने एक सेवक की तरह उनके राज पाट को सम्हाला, और उनके आने के बाद उन्हें सौंप दिया. आजकल रिश्तों में इतना प्रेम देखने को नहीं मिलता. पर यदि इंसान हर रिश्ते को समय दे तो सब कुछ संभव हो सकता है. यही रामायण हमें सिखाती है.