आक्रमणकारियों ने बहुत किया विनाश, पर नहीं बदल सके काशी का स्वरूप

जिस तरह से भगवान का नाम लेने से पुण्य मिलता है, उसी प्रकार सात पवित्र नदियों, सात पावन नगरियों और अष्ट पर्वतों के नाम लेने से भी पुण्य मिल जाता है। हमारे देश में धरती, जल, पाषाण, आकाश, अग्नि, वनस्पति आदि का पूजन करके उनके प्रति आभार माना जाता है, क्योंकि इनके बिना जीवन संभव नहीं होता है। जब पावन नगर की बात हो रही हो तो इनमें सबसे प्रमुख नाम है काशी का, जिसके बारे में कहा जाता है कि वहां सभी पाप खत्म हो जाते हैं।

काशी नगरी को वर्तमान में वाराणसी कहा जाता है। इसे बनारस के नाम से भी पहचाना जाता है। यह एक पौराणिक नगरी है और इसे संसार के सबसे पुराने नगरों में गिना जाता है। हरिवंशपुराण के अनुसार काशी को बसाने वाले भरतवंशी राजा ‘काश’ थे। कुछ विद्वानों का मत है कि काशी वैदिक काल से भी पहले की नगरी है। भारत की यह प्राचीन नगरी गंगा के उत्तर तट पर उत्तर प्रदेश के दक्षिण-पूर्वी कोने में वरुणा और असी नदियों के बीच बसी हुई है। इस स्थान पर गंगा ने प्राय: चार मील का दक्षिण से उत्तर की ओर घुमाव लिया है और इसी घुमाव के ऊपर यह नगर बसा हुआ है। इस नगर का प्राचीन नाम वाराणसी ही है, जो धीरे-धीरे ‘बनारस’ कहा जाने लगा था, जिसे उत्तर प्रदेश सरकार ने कुछ ही साल पहले शासकीय रूप से पहले की तरह ‘वाराणसी’ कर दिया है।

एक कथा के अनुसार महाराज सुदेव के पुत्र राजा दिवोदास ने पवित्र नदी गंगा के किनारे वाराणसी नगर बसाया था। एक बार भगवान शंकरजी ने देखा कि पार्वतीजी को अपने मायके हिमालय-क्षेत्र में रहने में संकोच होता है, तो उन्होंने किसी दूसरे सिद्धक्षेत्र में रहने का विचार बनाया। उन्हें काशी अतिप्रिय लगी। वे यहां आ गए। भगवान शिव के सान्निध्य में रहने की इच्छा से देवता भी काशी में आकर रहने लगे।

वैदिक साहित्य से जुड़े ब्राह्मण ग्रंथों एवं उपनिषदों में काशी का विशेष रूप से उल्लेख है। पाणिनि, पतंजलि आदि ग्रंथों में भी काशी की विस्तृत चर्चा है। पुराणों में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि काशी क्षेत्र में पग-पग पर तीर्थ हैं। यहां एक तिल भी स्थान ऐसा नहीं है, जहां शिवलिंग न हो। स्कंदपुराण काशी-खंड के दसवें अध्याय में चौंसठ शिवलिंगों का उल्लेख है। चीनी यात्री ह्वेनसांग जब भारत आया था, तो उसने उल्लेख किया है- कि उसके समय में वाराणसी में लगभग सौ मंदिर थे। उनमें से एक भी सौ फीट से कम ऊंचा नहीं था। विश्वनाथ की नगरी में तीर्थ स्थानों की कमी नहीं हैं, किंतु मत्स्यपुराण के अनुसार काशी में दशाखमेध, लोलार्क कुण्ड, केशव (आदि केशव), बिन्दु माधव, मणिकर्णिका पांच तीर्थ प्रमुख हैं। अठारहवीं शताब्दी के अंतिम चरण में महारानी अहिल्या बाई होलकर ने वर्तमान विश्वनाथ मंदिर का निर्माण करवाया था।

कहा जाता है कि सदियों पहले आक्रामणकर्ताओं ने काशी के मंदिरों में बहुत तोड़-फोड़ की थी। लेकिन फिर भी भगवान शिव की नगरी का विनाश नहीं कर सके। वर्ष 1585 में नारायण भट्ट के प्रयासों से विश्वनाथजी के मंदिर का जीर्णोद्धार किया गया था। बाद के सालों में मराठा राजाओं तथा सरदारों ने यहां अनेक मंदिर बनवाए। सन् 1828 में काशी के मंदिरों की गणना कराई गई थी जिसमें पता चला था कि काशी में एक हजार से ज्यादा मंदिर थे। इस समय 1455 मंदिर थे। कुछ और विद्वानों का कहना है कि उस समय लगभग 3500 मंदिर थे।

मणिकर्णिका को मुक्ति क्षेत्र भी कहा जाता है। पंचगंगा में पांच नदियों के धाराओं के मिलने की कल्पना की गई है। नारदीय पुराण तथा काशी-खण्ड में कहा गया है कि जो व्यक्ति पंचगंगा में स्नान करता है वह पंच तत्वों में स्थित इस शरीर को पुन: धारण नहीं करता, मुक्त हो जाता है। वरुणा-गंगा का संगम तीर्थ आदि केशव घाट बहुत ही प्राचीन है। भगवान विष्णु के भक्त कन्नौज के गहड़वाल राजाओं ने जब काशी को अपनी राजधानी बनाई तो इस भाग को और अधिक महत्व मिलने लगा।

वाराणसी में बहुत से उपतीर्थ हैं। यहां ज्ञानवापी भी एक पवित्र स्थल है। विश्वनाथ मंदिर से दो मील की दूरी पर भैरोनाथ का मंदिर है, उन्हें काशी का कोतवाल कहा जाता है। उनके हाथ में बड़ी एवं मोटे पत्थर की लाठी होने के कारण इन्हें दंडपाणि भी कहा जाता है। काशी में छप्पन विनायक (गणेश) मंदिर वर्णित है। ढुण्ढिराज गणेश एवं बड़ गणेश काशी में ही है। काशी के चौदह महालिंग प्रसिद्ध है। पुराणों में काशी के तीर्थों एवं उपतीर्थों का वर्णन बड़ी संख्या में मिलता है। काशी में सवा सौ तीर्थों का उल्लेख मिलता है। यही वजह है कि काशी अत्यंत पावन नगरी है और यहां आकर तीर्थों के दर्शन-पूजन और पवित्र गंगा में स्नान करना पुण्य देने वाला होता है।