भगवान कृष्ण ही चाहते थे महाभारत के लिए कुरुक्षेत्र का मैदान

ये तो सबको पता है कि गीता का उपदेश श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कुरुक्षेत्र में ही दिया था, जहां महाभारत का युद्ध हुआ था. लेकिन महाभारत का युद्ध आखिर कुरुक्षेत्र में ही क्यों हुआ था, किसी और जगह क्यों नहीं? कुरुक्षेत्र की धरती को महाभारत के युद्ध के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने ही चुना था, लेकिन उन्होंने कुरुक्षेत्र को ही महाभारत युद्ध के लिए क्यों चुना, इसके पीछे एक गहरा रहस्य छुपा है.

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महाभारत का युद्ध धर्म और अधर्म के बीच के था. पांडवों और कौरवों के बीच साम्राज्य और सत्ता के लिए हुए इस युद्ध में उस समय भारत के सभी जनपदों ने भाग लिया था. इस युद्ध में लाखों क्षत्रिय योद्धा मारे गए. केवल इतना ही इस युद्ध में भारतवर्ष के राजाओं अलावा बहुत सारे अन्य देशों के क्षत्रिय राजाओं ने भाग लिया था. कहते हैं इस युद्ध के बाद दुनिया में वीर क्षत्रिय योद्धों का अभाव हो गया था. इतने बड़े पैमाने पर हुए वीरों के अंत की वजह से ये धरती कई सालों तक वीरों से खाली हो गई थी. इस युद्ध को जिस स्थान पर लड़ा गया था वो उस जगह का नाम तब भी कुरुक्षेत्र था. और आज भी वही है. यही कुरुक्षेत्र आज हरियाणा में स्थित है.

जब यह निश्चित हो गया कि युद्ध तो होगा ही, तो दोनों पक्षों ने युद्ध के लिए तैयारियाँ शुरू कर दी थीं. दुर्योधन पिछले 13 वर्षों से युद्ध की तैयारी कर रहा था, इन 13 वर्षों में दुर्योधन के मामा शकुनी ने ज़्यादातर जनपदों को अपनी तरफ कर लिया था. दुर्योधन कर्ण को अपनी सेना का सेनापति बनाना चाहता था परन्तु शकुनि के समझाने पर दुर्योधन ने पितामह भीष्म को अपनी सेना का सेनापति बनाया, जिसके कारण भारत और विश्व के कई जनपद दुर्योधन के पक्ष मे हो गये. पाण्डवों की तरफ केवल वही जनपद थे जो धर्म और श्रीकृष्ण के पक्ष मे थे. महाभारत के अनुसार महाभारत काल में कुरुराज्य विश्व का सबसे बड़ा और शक्तिशाली जनपद था. विश्व के सभी जनपद कुरुराज्य से कभी युद्ध करने की भूल नहीं करते थे एवं सौहार्दपूर्ण संबंध बनाए रखते थे.

शास्त्रों के मुताबिक, महाभारत का युद्ध जब तय हो गया तो उसके लिये जमीन तलाश की जाने लगी. भगवान श्रीकृष्ण इस युद्ध के जरिए धरती पर बढ़ते पाप को मिटाना चाहते थे और धर्म की स्थापना करना चाहते थे.

कहते हैं कि भगवान श्रीकृष्ण को ये डर था कि भाई-भाइयों के, गुरु-शिष्यों के और सगे-संबंधियों के इस युद्ध में एक दूसरे का अंत होते हुए देखकर कहीं कौरव और पांडव संधि न कर लें. इसलिए उन्होंने युद्ध के लिए ऐसी भूमि चुनने का फैसला किया, जहां क्रोध और द्वेष पर्याप्त मात्रा में हों. इसके लिए श्रीकृष्ण ने अपने दूतों को सभी दिशाओं में भेजा और उन्हें वहां की घटनाओं का जायजा लेने को कहा.

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सभी दूतों ने सभी दिशाओं में घटनाओं का जायजा लिया और भगवान श्रीकृष्ण को एक-एक कर उसके बारे में बताया. उसमें से एक दूत ने एक घटना के बारे में बताया कि कुरुक्षेत्र में एक बड़े भाई ने अपने छोटे भाई को खेत की मेंड़ टूटने पर बहते हुए वर्षा के पानी को रोकने के लिए कहा, लेकिन उसने ऐसा करने से साफ इनकार कर दिया. इस पर बड़ा भाई गुस्से से आग बबूला हो गया और उसने छोटे भाई का अंत कर दिया. दूत द्वारा सुनाई इस सच्ची घटना को सुनकर श्रीकृष्ण ने तय किया कि यही भूमि भाई-भाई, गुरु-शिष्य और सगे-संबंधियों के युद्ध के लिए बिल्कुल उपयुक्त है. श्रीकृष्ण अब बिल्कुल निश्चिंत हो गए कि इस भूमि के संस्कार यहां पर भाइयों के युद्ध में एक दूसरे के प्रति प्रेम उत्पन्न नहीं होने देंगे. इसके बाद उन्होंने महाभारत का युद्ध कुरुक्षेत्र में करवाने का एलान कर दिया. और एक ऐसे धर्म युद्ध का प्रारंभ हो गया जो धरती के इतिहास में आजतक का सबसे बड़ा युद्ध माना जाता है. जिसके बाद धरती पर धर्म की स्थापना का शुभारम्भ हुआ.