माता शबरी से जहां मिले थे भगवान श्रीराम, वहां आज भी हैं बेर के छोटे छोटे पेड़

प्रभु श्रीराम का सम्पूर्ण जीवन मानवजाति के लिए मर्यादा और आदर्श की सच्ची मिसाल है। उनके जीवन में सदैव संघर्ष रहा, पर उन्होंने हमेशा मर्यादा का पालन ही किया। वनवास के आखिरी वर्षों में भगवान श्रीराम ने काफी कष्ट उठाए। यह भगवान की लीला ही थी कि उन्होंने स्वयं कष्ट उठाते हुए मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में अपने अवतार लेने का उद्देश्य पूरा किया। पंचवटी और नासिक से आगे बढ़ते हुए भगवान श्रीराम ने आज के आंध्र प्रदेश में प्रवेश किया। पंचवटी में माता सीता का हरण हो जाने के बाद भगवान श्रीराम और लक्ष्मणजी की अगली यात्रा सीताजी की खोज से संबंधित रही।

ImageSource

माता सीता की खोज करते हुए सर्वतीर्थ और पर्णशाला के बाद भगवान श्रीराम और लक्ष्मणजी तुंगभद्रा तथा कावेरी नदी के क्षेत्र में पहुंच गए। इन दोनों क्षेत्रों के अनेक स्थलों पर वे सीताजी की खोज में गए। इधर, तुंगभद्रा और कावेरी नदी को पार करते हुए श्रीराम और लक्ष्‍मणजी सीताजी की खोज में आगे बढ़े। जटायु और कबंध से मिलने के पश्‍चात वे ऋष्यमूक पर्वत पहुंचे । रास्ते में वे पम्पा नदी के पास शबरी आश्रम भी गए।

सभी जानते हैं कि श्रीराम और लक्ष्मणजी ने सीताजी की खोज के दौरान शबरी के आश्रम में आकर उसके जूठे बेर खाए थे। इसी प्रसंग को लेकर इस स्थान को शबरी-नारायण कहा गया। कालान्तर में यह बिगड़कर शिवरीनारायण कहलाने लगा। प्राचीन काल में इस क्षेत्र में खर-दूषण का राज था, जो श्रीराम के हाथों वीरगति को प्राप्त हुआ था। कदाचित् उन्हीं के नाम पर यह नगर खरौद कहलाया।

शबरी धाम दक्षिण-पश्चिम गुजरात के डांग जिले के आहवा से 33 किलोमीटर और सापुतारा से लगभग 60 किलोमीटर की दूरी पर सुबीर गांव के पास मौजूद है। शबरी धाम वही जगह है जहां शबरी और भगवान श्रीराम की मुलाकात हुई थी। शबरी धाम अब एक धार्मिक पर्यटन स्थल में बदलता जा रहा है। यहां से कुछ ही किलोमाटर की दूरी पर ही पम्पा सरोवर है। ऐसा माना जाता है कि यह वही तालाब है जहां हनुमानजी की तरह शबरी ने भी स्नान किया था।

ImageSource

रामायण में आई कथा के अनुसार शबरी ने भगवान श्रीराम को बेर खिलाए थे, लेकिन इससे पहले उन्होंने इन बेरों को चखकर यह पता कर लिया था कि ये मीठे हैं या नहीं। यहां एक छोटी- सी पहाड़ी पर एक छोटा- सा मंदिर बना हुआ है। कहा जाता है कि शबरी यहीं रहती थीं। यहां मंदिर के आसपास छोटे-छोटे बेर के पेड़ आज भी दिखाई देते हैं। मंदिर खासतौर पर रामायण के शबरी प्रसंग से जुड़ी तस्वीरें यहां बनी हुई हैं। भगवान श्रीराम, लक्ष्मणजी एवं शबरी की इन्हें यादों को बनाए रखने के लिए यहां ‘शबरी कुम्भ’ आयोजित किया जाता है।