जान दे दी लेकिन अंग्रेजों को किले पर कब्ज़ा नहीं करने दिया महारानी लक्ष्मीबाई ने

भारत वीरों की धरती है। इस देश के महान वीर योद्धाओं ने हर बार अपनी जान की बाज़ी लगाकर देश की आन बान शान को बचाया है। युद्ध चाहे मुगलों के साथ हुआ हो, खिलजी के साथ या गौरी के साथ, सबने बार बार यहाँ पराजय का मुंह देखा, हाँ ये बात अलग है कि, हमारे बीच के ही कुछ गद्दारों ने देश की गरिमा को धूमिल किया, और दुश्मन के साथ मिलकर धोखे से वीर योद्धाओं के साथ छल किया।

कवियित्री सुभद्रा कुमार चौहान की वह कविता सुनकर हम बड़े हुए हैं, जिसमें इस देश की एक महान वीरांगना की वीर गाथा है।

“बुंदेले हरबोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी’

इन झांसी की रानी की महानता झलकती है। ये वीरांगना थी, जिसने अपनी जान देकर ग्वालियर के किले और देश की आन को कायम रखा।

आज 18 जून है, महारानी लक्ष्मीबाई की याद में हम सब इस दिन को बलिदान दिवस के रूप में मनाते हैं। 1857 की क्रांति को इस देश की आज़ादी की पहली लड़ाई माना जाता है। और इस लड़ाई को झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने अपनी सेना के साथ शुरू की थी।

1 जून 1858 को रानी लक्ष्मीबाई ने मराठाओं के साथ मिलकर अंग्रेजों के साथ युद्ध करके ग्वालियर के किले को हासिल किया, लेकिन इस जीत के जश्न के बीच 17 जून को जनरल ह्यूज के नेतृत्व वाली ब्रिटिश सेना ने हमला कर दिया। रानी लक्ष्मीबाई खूब लड़ीं और अंग्रेजों को किले पर कब्जा नहीं करने दिया, लेकिन इस दौरान उन्हें गोली लग गई और अगले दिन आज की ही तारीख यानि 18 जून को उनका निधन हो गया। यह ग्वालियर की लड़ाई के नाम से जानी जाती है। और महारानी लक्ष्मीबाई के बलिदान दिवस के रूप में भी हम सब इस दिन को याद करते हैं। इस महान वीरांगना को बलिदान दिवस पर शत शत नमन।