न्याय के लिए हमेशा सबसे आगे खड़ी हो जाती थीं माता सुमित्रा

अयोध्या के महाराजा दशरथ की तीन महारानियां थी – माता कौशल्या, माता कैकेयी और माता सुमित्रा। माता कौशल्या पटरानी थी जबकि माता कैकेयी महाराजा दशरथ को सर्वाधिक प्रिय थी वहीं माता सुमित्रा माता कौशल्या की सेवा करना अपना धर्म समझती थी। माता कौशल्या ने भगवान श्रीराम को, माता कैकेयी ने भरत को जबकि माता सुमित्रा ने लक्ष्मणजी और शत्रुघ्न को जन्म दिया। भगवान श्रीराम को जन्म देने वाली माता कौशल्या और उन्हें वनवास पर भेजने वाली माता कैकेयी के चरित्र के बारे में शास्त्रों में विस्तार से वर्णन किया गया हैं, लेकिन माता सुमित्रा के चरित्र के बारे में कम ही जानकारी मिलती है। वाल्मीकि ‘रामायण’ के अलावा भगवान श्रीराम के जीवन पर लिखे अन्य धार्मिक ग्रंथों में माता सुमित्रा के चरित्र का उल्लेखनीय वर्णन नहीं है। जबकि रामायण में माता सुमित्रा जैसा त्याग का अनुपम आदर्श और कहीं मिलना असंभव है।

माता सुमित्रा ह्रदय ममतामयी था। वह चारों राजकुमारों से बहुत स्नेह रखती थी। चारों राजकुमार भी माता सुमित्रा से बहुत प्रेम करते थे और उनकी गोद में ही सोते थे। कभी-कभी माता कौशल्या प्रभु श्रीराम को अपने पास सुला लेती थी, लेकिन रात में जब श्रीराम की नींद खुलती तो वह माता सुमित्रा के पास जाने के लिए रोने लगते और माता कौशल्या को उन्हें माता सुमित्रा के पास छोड़कर आना ही पड़ता था।

माता सुमित्रा प्रखर, प्रभावी और न्याय के लिए दृढ़ता से खड़ी रहने वाली स्त्री थीं। भगवान श्रीराम भी माता सुमित्रा के व्यक्तित्व से भली-भांति परिचित थे। यहीं कारण है कि जब भगवान श्रीराम वनवास पर जाने वाले थें तो उन्होंने माता कौशल्या से वनवास पर जाने की अनुमति मांगी, लेकिन वह माता सुमित्रा के पास नहीं गए। श्रीराम ने अपने भाई लक्ष्मण को माता सुमित्रा से वनवास पर जाने की अनुमति लेने के लिए भेजा। श्रीराम जानते थे कि माता सुमित्रा में न्याय के लिए दृढ़तापूर्वक खड़े होने का साहस है और यदि वह न्याय के लिए अड़ गई तो फिर कोई भी उनका विरोध नहीं कर पाएगा।

ImageSource

रामायण में एक प्रसंग हैं कि जब लक्ष्मण ने माता सुमित्रा से प्रभु श्रीराम के साथ वनवास पर जाने की अनुमति मांगी तो माता सुमित्रा ने लक्ष्मण से कहा कि तुम श्रीराम को पिता, सीता को माता और वन को अयोध्या मानकर सुख पूर्वक श्री राम के साथ वन जाओ। वहीँ एक अन्य प्रसंग हैं कि युद्ध के दौरान लक्ष्मण मूर्च्छित होकर रणभूमि गिर पड़े थे। जब इस बात का समाचार माता सुमित्रा को मिला तो उन्होंने कहा कि मेरा पुत्र श्रीराम के लिए लड़ते हुए जमीन पर गिरा है। यह जानकर मैं धन्य हो गई। मेरे पुत्र ने मुझे पुत्रवती होने का सच्चा गौरव प्रदान किया है। प्राणों से भी प्यारे अपने पुत्र को सहर्ष वनवास पर भेज देना और उनके मूर्छित होने पर भी गर्व करना, यह उनकी चारित्रिक उदारता का प्रमाण है।