न राजा, न साम्राज्य..केवल परमात्मा ही बचा सकते हैं प्रकृति के प्रकोप से

महाभारत युद्ध में अपने पिता द्रोणाचार्य के धोखे से मारे जाने पर अश्वत्थामा बहुत क्रोधित हो गये। भयंकर गुस्से में उन्होंने पांडव सेना पर एक बहुत ही भयानक अस्त्र “नारायण अस्त्र” छोड़ दिया। ये एक ऐसा अस्त्र था, जिसका कोई भी सामना नहीं कर सकता था। जिन लोगों के हाथ में हथियार हो और लड़ने के लिए कोशिश करता दिखे उस पर भी यह अस्त्र अग्नि बरसाता था और तुरंत नष्ट कर देता था।

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भगवान श्रीकृष्ण जी ने सेना को अपने अपने अस्त्र शस्त्र छोड़ कर, चुपचाप हाथ जोड़कर खड़े रहने का आदेश देते हुए कहा, ‘आप सब अपने मन में युद्ध करने का विचार भी न लाएं, यह उन्हें भी पहचान कर नष्ट कर देता है।’

नारायण अस्त्र धीरे धीरे अपना समय समाप्त होने पर शांत हो गया। इस तरह पांडव सेना की रक्षा हो गयी।

इस कथा प्रसंग का औचित्य समझें?

हर जगह लड़ाई सफल नहीं होती। मनुष्य का सम्पूर्ण जीवन परमात्मा के हाथ में होता है, भले ही आज मनुष्य ने धरती पर सबकुछ जीत लिया हो, लेकिन फिर भी जीवन, मृत्यु, और प्रकृति में होने वाली समस्त घटनाओं का परिवर्तन परमात्मा के हाथ में हाथ में होता है। मनुष्य चाहकर भी उनके लिए कुछ नहीं कर सकता। बाढ़ और बारिश के प्रकोप ने इस समय केवल हमारे देश में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में तबाही मचा रखी है। हर बार, हर साल, यही हो रहा है, कभी किसी राज्य में, तो कभी कहीं, और मनुष्य को इससे जूझकर न केवल अपने जीवन और परिवार की रक्षा करनी होती है, बल्कि जीपन यापन के दूसरे साधनों को भी इस तबाही से बचाना होता है, पर वही होगा जैसा प्रकृति चाहती है, इसलिए प्रकृति के प्रकोप से बचने के लिए हमें भी कुछ समय के लिए सारे काम छोड़ कर, चुपचाप हाथ जोड़कर, मन में सुविचार रख कर जीवन रक्षा की प्रार्थना करना चाहिए और जाने अनजाने में हुईं गलतियों के लिए क्षमा मांगनी चाहिए, तभी हम इसके कहर से बचे रह पाएंगे।

भगवान श्रीकृष्ण जी का बताया हुआ उपाय है, यह व्यर्थ नहीं जाएगा।