पांडवों का बसाया हुआ इन्द्रप्रस्थ कैसे बन गया दिल्ली

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कहते हैं दिल्ली हिंदुस्तान का दिल है, और हो भी क्यों नहीं, यहीं से देश के राजनैतिक समीकरण बनते हैं, जब दिल्ली के सियासी के गलियारों में हलचल होती है, तो पूरे देश में उसका असर होता है| इतिहास के आईने में देखें तो जब जब भारत पर किसी बाहरी दुश्मन ने आक्रमण किया तो सबसे पहले उसकी नज़र दिल्ली पर ही रही| हुकूमत करने वालों का गढ़ रहा है दिल्ली, और आज तक वही सिलसिला बरकरार है|

जानकारी के अनुसार पहले दिल्ली का नाम इन्द्रप्रस्थ हुआ करता था, और इसे पांडवों ने बसाया था| महाभारत काल में पांडवों ने इसे अपनी राजधानी बनाया था| और आज यही दिल्ली भारत की राजधानी है| एक और मान्यता के अनुसार, पांडवों ने, कौरवों से पांच गाँव मांगे थे, जिनके अंत में ‘पत’ शब्द आता हो, और इन गांवों का नाम था, सोनीपत, पानीपत, तिलपत, बागपत और इन्दरपत| संस्कृत में पत को ‘प्रस्थ’ कहा जाता है| और ये सभी स्थान आज दिल्ली के आसपास हैं|

इन्द्रप्रस्थ का नाम दिल्ली कैसे पड़ा, इस बात के पीछे एक नहीं कई कहानी हैं| जिनमें से एक कहानी के अनुसार प्राचीन समय में मौर्य वंश के एक राजा थे धिल्लु| जिन्हें दिलु भी कहा जाता था| और कहा जाता है कि, उन्ही राजा के नाम पर धिल्लु का यही नाम बाद में दिल्ली हो गया|
एक और कहानी के अनुसार, तोमर वंश के दौरान जो सिक्के बनाये जाते थे, उन सिक्को को ‘देहलीवाल’ कहा जाता था| इसी वजह से बाद में शहर का नाम भी दिल्ली हो गया|ImageSource

दिल्ली के बारे में इतिहास के पन्नों से और एक जानकारी ये है कि, दिल्ली या दिल्लिका शब्द सबसे पहले राजस्थान के उदयपुर से मिले शिलालेखों पर पाया गया था| इस शिलालेख का समय 1170 ईसवी माना जाता है| और महाराज पृथ्वीराज चौहान को दिल्ली का अंतिम हिन्दू सम्राट माना जाता है|

दिल्ली एक है, लेकिन इसकी कहानियां कई हैं| ये भी सच है कि, दिल्ली को हमेशा से हिंदुस्तान की दहलीज़ माना जाता रहा है, दिल्ली नाम होने की ये भी एक वजह है|