मिथिला के लोग आज भी निभाते हैं भगवान श्रीराम के साथ अपना रिश्ता

मानव कल्याण और उनके दु:खों को दूर करने के लिए भगवान विष्णु ने त्रेता युग में श्रीराम के रूप में अयोध्या में राजा दशरथ के यहां अवतार लिया। वे अवतार लेने के बाद महलों में रहने की बजाय लोगों के बीच पहुंचे और उनकी परेशानियां दूर की। ऋषि विश्वामित्र के साथ राम-लक्ष्मण वनों में गए थे और उन्होंने ऋषि-मुनियों के यज्ञ में बाधा पहुंचाने वाली ताड़का राक्षसी और सुबाहु राक्षस का अंत कर दिया था, फिर भगवान राम और लक्ष्मण ऋषि के साथ गौतम आश्रम (आज के अहिरौली गांव) पहुंचे और वहां अहिल्या उद्धार किया। इसके बाद ॠषि विश्वामित्र ने राम-लखन के साथ राजा जनक के धनुष यज्ञ में शामिल होने के लिए मिथिला की यात्रा की थी।

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इस तरह भगवान राम का मिथिला से गहरा नाता रहा है। यहां ऐसे कई स्थान हैं, जिनका संबंध सीधे तौर पर भगवान राम व मां सीता से है। इसमें हरलाखी के फुलहर, गिरिजा स्थान, कलानेश्वर, विश्वामित्र आश्रम इत्यादि प्रमुख स्थल हैं, जो आज भी भगवान राम के आगमन के ठोस सबूत हैं। रामायण में जनक के सुंदर सदन की कथा प्रचलित है। ॠषि विश्वामित्र और दशरथ कुमार भगवान राम और लक्ष्मण के धनुष यज्ञ में शामिल होने के लिए मिथिला आगमन की खबर सुनकर राजा जनक ने जहां उनके ठहरने का समुचित प्रबंध किया था, वो स्थान अब विशौल गांव के नाम से जाना जाता है। इसी कारण यह स्थान विश्वामित्र आश्रम के नाम से प्रसिद्ध हो गया।

रामायण काल के अनुसार इसी जगह पर राम अपने भाई लक्ष्मण के साथ अपने गुरु के लिए पूजा के फूल लेने पुष्प वाटिका गए थे, जहां पर सीता के साथ उनकी पहली मुकालात हुई थी। यही पुष्प वाटिका आज हरलाखी के फुलहर के नाम से जानी जाती है। यह बात अलग है कि उचित देख रेख के अभाव में फुलहर में न तो वह पुष्प वाटिका रही और न ही वह रमणीयता। इसके बावजूद लोगों के मन में इस स्थान को लेकर श्रद्धा बरकरार है। आज भी लोग यहां की पवित्र माटी की इसलिए पूजा करते हैं, क्योंकि यहां भगवान राम के चरण पड़े थे। ऋषि विश्वामित्र के साथ राम-लखन को ठहराने के स्थान फिर यहां की पुष्पवाटिका के प्रमाण देखकर भक्ति में डूबे लोग यहां घंटों बैठकर उनका स्मरण करते हैं।

बड़ी बात तो यह है कि यहां के स्थानीय लोग आज भी भगवान राम को जमाई राजा के रूप में भी मानते हैं। यह भी उल्लेखनीय है कि भगवान राम को याद किए बिना मिथिला में कोई पूजा या विधि-विधान पूरा नहीं माना जाता है। मर्यादा पुरुषोत्तम राम के साथ होली मनाने की परंपरा भी मिथिला में ही है- ‘मिथिला में राम खेलथि होरी/ मिथिला में…’ इन गीतों के माध्यम से मिथिलावासी भगवान राम को अपने दामाद के रूप में मानते हैं और इस रिश्ते पर गर्व करते हैं।