रघुकुल रीति

रघुकुल रीति सदा चलि आई
प्रान जायं पर बचन न जाई।।

कई कई वर्ष पहले दिए गए वचन को पूरा करने के लिए दशरथ जी ने अपने प्राणों से प्रिय पुत्र को भी वनवास की आज्ञा दे दी
ये है रघुकुल की वचनबद्धता – जो कहते हैं वो करते हैं।

राज सिंहासन पर बिठाने के बजाय 14 वर्षों के लिए वनवास दे दिया गया फिर भी राम के चेहरे पर एक शिकन नहीं आई।
उल्टा उन्होंने वनवास का वरदान मांगने वाली अपनी माता कैकेई को धन्यवाद कहते हुए कहा कि जो सुख मुझे चौथेपन में मिलना था वही सुख आपकी कृपा से मुझे जीवन के प्रथम चरण में ही मिलने जा रहा है।
राम जी कहते हैं
सुनु जननी सोइ सुत बड़भागी
जो पितु मातु चरण अनुरागी ।।
अर्थात बेटा वही भाग्यवान है जो अपने माता पिता के चरणों से प्रेम करने वाला हो और उनकी सेवा करने वाला हो।

जय श्रीराम 🙏

Gepostet von Arun Govil am Freitag, 8. Mai 2020

इस प्रकार पिता दशरथ, माता कौशल्या सबको आनंदित मन से समझा कर रामजी वन जाने के लिए तैयार हो जाते हैं। जब सीता जी को ये समाचार मिलता है तो वे बिना एक पल सोचे, संसार के सारे सुख त्याग कर राम जी के साथ वन जाने की प्रतिज्ञा कर लेती हैं।
एक तरफ धरती के सबसे बड़े साम्राज्य का राज्य सुख, जीवन के समस्त ऐश्वर्य और साधन और दूसरी तरफ बीहड़ जंगल का भयावह, दुखदाई जीवन।
परंतु सीता जी हर हाल में राम जी के साथ वन जाने का निश्चय करती हैं।

राम जी के लाख समझाने के बाद भी सीता जी यही कहती हैं
आप शरीर हैं और मैं आप की छाया हूँ, जहां आप वहां मैं। आप राज सिंहासन पर विराजें या वन में रहें, मैं आपके साथ ही रहूँगी।
आज अधिकांश मामलों में पति पत्नी का रिश्ता प्रेम समर्पण से ज्यादा स्वार्थ पूर्ति के लिए रह गया है।

Jai Shriram 🙏#goodmorning

Gepostet von Arun Govil am Freitag, 22. Mai 2020

 

सीता जी का चरित्र, सीता जी की भावनाएं और सीता जी का व्यवहार संसार की हर नारी के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है। आज जबकि पति पत्नी के रिश्तो की परिभाषा बदलती जा रही है, पारिवारिक उत्तरदायित्व की परिभाषा बदलती जा रही है ऐसे में सीता जी का चरित्र अपने व्यवहार में लाकर संसार की नारियां न केवल अपना बल्कि अपने परिवार का, अपने देश का और संपूर्ण मानव समाज का कल्याण कर सकती हैं।

भाई के प्रति भाई का प्रेम देखना है तो लक्ष्मण जी के विचार और व्यवहार देखिए। जब उन्हें पता चलता है कि श्रीराम को सिंहासन के बदले वनवास दिया जा रहा है तो वे अपना आपा खो बैठे और अकेले ही अयोध्या की सारी सेना से लोहा लेने के लिए तैयार हो गए।
आज जहां एक भाई दूसरे भाई का अधिकार छीनने में लगा हुआ है वहीं लक्ष्मण जी, राम जी को अयोध्या के सिंहासन पर बिठाने के लिए अपने प्राण तक न्योछावर करने का संकल्प कर लेते हैं।

वहीं महाराज दशरथ की स्थिति-
एक सत्यवादी राजा का धर्म एक पिता के धर्म से टकरा रहा है। दशरथ जी की अवस्था शिकारी के जाल में फंसे एक घायल शेर की जैसी है। राम जी के लाख समझाने के बाद भी लक्ष्मण जी अयोध्या के सारे राजसी सुख साधन त्याग कर राम जी की सेवा में उनके साथ वन जाने की प्रतिज्ञा करते हैं।

इस प्रसंग में सुमित्रा माता का व्यवहार वंदनीय है । वे बिना एक पल सोचे अपने पुत्र को बड़े भाई राम की सेवा में जाने की आज्ञा देती हैं। माता सुमित्रा कहती है कि लक्ष्मण तुम्हें वन या नगर से क्या लेना, जहां तुम्हारे सीताराम वहीं तुम्हारा सबकुछ। पूरी तन्मयता से सीताराम की सेवा करना।

धन्य है ऐसी मां सुमित्रा
धन्य है पत्नी के रूप में माता सीता
धन्य है भाई के रूप में प्रभु श्री लक्ष्मण।