अपने तीन जन्मों में राक्षस और अनाचारी ही था रावण

श्रीराम और रावन के बीच हुए धर्म और अधर्म के महायुद्ध की कहानी थी रामायण. रावन प्रकांड विद्वान ब्राह्मण था, और अपने जीवन काल में उसने बहुत तपस्या की थी. शास्त्रों का ज्ञाता होने के बाद भी वो अधर्म की राह पर चला, और अपने अभिमान में अपने कुल का विनाशक बन गया.

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पौराणिक मान्यता के अनुसार,एक बार बैकुंठ में भगवान विष्णु के दर्शन के लिए सनक और सनंदन नाम के ऋषि पधारे, किन्तु उस समय वहां उपस्थित भगवान विष्णु के द्वारपाल जय और विजय ने, उन्हें प्रवेश की अनुमति ही नहीं दी, जिसकी वजह से ऋषिगण क्रोधित हो गए, और उन्होंने जय और विजय को श्राप दिया कि, तुम दोनों हमेशा के लिए राक्षस बन जाओगे, जय और विजय ये सुनकर घबरा गए और उन्होंने, ऋषियों से क्षमा मांगी, और भगवान विष्णु ने भी ऋषियों से निवेदन किया कि, उन दोनों को क्षमा कर दें, उसके बाद ऋषियों ने अपने श्राप के असर को थोड़ा कम करते हुए कहा कि, तीन योनियों तक तुम दोनों को राक्षस और अनाचारी पुरुषों के रूप में जन्म लेना पड़ेगा, उसके बाद ही तुम्हारी मुक्ति सम्भव होगी. लेकिन मुक्ति के लिए तुम्हे भगवान विष्णु या उनके किसी अवतार के के हाथों मरना होगा.

उसके बाद उन दोनों द्वारपालों ने पहले हिरण्याक्ष व हिरण्यकश्यप नाम के राक्षसों के रूप में जन्म लिया, उन दोनों में हिरण्याक्ष इतना शक्तिशाली था कि, उसने पृथ्वी को उठाकर पाताललोक में पहुंचा दिया था. उसके बाद भगवान विष्णु ने वराह अवतार धारण करके हिरण्याक्ष का वध किया और पृथ्वी को मुक्त करके वापस यथावत लेकर आये. इसी वजह से उसका भाई हिरण्यकश्यप, भगवान विष्णु का घोर विरोधी बन गया, और अपनी ताक़त के मद में उसने पृथ्वी पर अत्याचार करना शुरू कर दिया, यहांतक कि, अपने विष्णु भक्त पुत्र प्रह्लाद को मारने के लिए भी उसने बहुत प्रयत्न किये, पर हर बार असफल रहा, और अंत में भगवान विष्णु ने, नरसिंह अवतार धारण करके उसका वध किया.

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उसके बाद अगले जन्म में उन दोनों ने रावन और कुम्भकर्ण के रूप में जन्म लिया, और श्रीराम के हाथों उन दोनों को मुक्ति मिली. और तीसरे जन्म में उन दोनों ने द्वापर युग में शिशुपाल व दंतवक्त्र जैसे अनाचारियों के रूप में जन्म लिया, और उन्हें भगवान कृष्ण के हाथों मुक्ति मिली.