दिवंगतों के प्रति श्रद्धा जताने का पर्व है श्राद्ध पक्ष

हमारी भारतीय संस्कृति में आस्था, श्रद्धा और सम्मान का बड़ा महत्व है। हम भगवान के प्रति तो आस्था रखते ही हैं लेकिन अपने दिवंगत पूर्वजों के प्रति भी अपार श्रद्धा रखते हैं और देवता समान मानकर उनकी पूजा करते हैं। अन्य पर्व-त्योहारों की तरह ही हमारी संस्कृति में अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा जताने के लिए पूरे 16 दिनों का श्राद्ध पक्ष आता है, जिसमें हम तिथि के मुताबिक अपने पूर्वजों और परिवार के दिवंगत सदस्यों की आत्मा की तृप्ति के लिए श्राद्ध कर्म करते हैं। महाभारत में श्राद्ध कर्म और पितरों की पूजा का उल्लेख भीष्म पितामह ने किया है, उन्होंने युधिष्ठिर को श्राद्ध के संबंध में कई तरह की बातें बताई थी। गरुण पुराण में पितरों और श्राद्ध के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई है। श्राद्ध पूजा करने से पितृ दोषों से मुक्ति मिलती है।

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शास्त्रों में कहा गया है श्रद्धया इदं श्राद्धं, मतलब पूर्वजों के लिए जो श्रद्धा से किया जाए, वह श्राद्ध है। सनातन संस्कृति में पितृ पक्ष का महत्व और ये तिथियां व्यक्ति के जीवन में काफी महत्व रखती हैं। भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन कृष्णपक्ष अमावस्या तक के सोलह दिनों को पितृपक्ष कहते हैं, जिसमें हम अपने पूर्वजों की सेवा करते हैं। हर कोई अपने पितरों की आत्मशांति की इच्छा रखता है, जिसके लिए इन तिथियों में श्राद्ध कर्म का विधान और परंपरा है। माना जाता है कि जिस तिथि में मृत्यु होती है, उसका श्राद्ध उसी तिथि में श्राद्ध पक्ष के दौरान किया जाता है। श्राद्ध पक्ष में तर्पण करने, पिंड दान, भोजन कराने और दान-पुण्य करने का काफी महत्व होता है। ऐसा माना जाता है कि इस दौरान हमारे पितर स्वर्ग से धरती पर उतरते हैं। ऐसे में हमारा दायित्व होता है कि हम इस दौरान उनके नाम से पूरी श्रद्धा के साथ दान-पुण्य और जरूरतमंद लोगों को भोजन कराएं। हमारी संस्कृति का यह अनोखा पर्व है, जिसमें हम मृतकों के लिए तो श्रद्धा रखते हुए पुण्य कार्य करते ही हैं, लेकिन इस दौरान कौवे जैसे पक्षी, कीट-पतंगे, गाय, अतिथि और अन्य लोगों को भी खुशी से भोजन कराते हैं। ऐसा माना जाता है कि यह भोजन-पानी और दान-पुण्य जिस मृतक के लिए नाम से किया जाता है, वह उसकी आत्मा को प्राप्त होता है।

हमारी संस्कृति में तीर्थों का भी बहुत महत्व होता है। माना जाता है कि तीर्थों में किए गए श्राद्ध का विशेष फल मिलता है। खास बात यह है कि कुछ तीर्थ तो श्राद्ध कर्म के कारण ही प्रसिद्ध हैं, क्योंकि वहां तर्पण और श्राद्ध करने से दिवंगत को मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है।

हरिद्वार- ऐसे तीर्थ स्थलों में सबसे पहले हरिद्वार का नाम आता है, हरि का द्वार यानी हरिद्वार, यहां पर किए गए श्राद्ध कर्म का फल दोगुना मिलता है और पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है।

ब्रह्म कपाल घाट- उत्तराखंड में स्थित ब्रह्म कपाल घाट का भी श्राद्ध कर्म के लिए बड़ा महत्व है। कहते हैं भगवान शिवजी को यहीं पर ब्रह्म हत्या के पापों से मुक्ति मिली थी। यहां श्राद्ध कर्म करने से पूर्वजों की आत्माएं तृप्त होती हैं और उन्हें स्वर्गलोक मिलता है। इसके बाद कहीं भी श्राद्ध कर्म करने की जरूरत नहीं होती। इस तीर्थ के पास ही अलकनंदा नदी बहती है। पांडवों ने भी यहां अपने परिजनों की आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध किया था।

गया- बिहार में फल्गु नदी के तट पर बसा शहर है गया। पितृ पक्ष के दौरान यहां हजारों श्रद्धालु श्राद्ध कर्म के लिए आते हैं, क्योंकि यहां श्राद्ध कर्म करने से पूर्वजों को भगवान विष्णु के बैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है। इस तीर्थ के बारे में रामायण में भी उल्लेख है।

प्रयाग- तीर्थों में सबसे बड़ा तीर्थ उत्तरप्रदेश का प्रयाग है, इसीलिए इसे तीर्थराज भी कहते हैं। गंगा, यमुना, सरस्वती नदियों का संगम होने के कारण यहां पर श्राद्ध कर्म करना सबसे अच्छा माना जाता है। कहते हैं कि यहां श्राद्ध कर्म विधि-विधान से करने पर वह जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्त हो जाता है।

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मेघंकर – महाराष्ट्र के मेघंकर तीर्थ का वर्णन ब्रह्मपुराण, पद्मपुराण आदि धर्म ग्रंथों में है। यहां स्नान का बड़ा महत्व है। यह स्थान पैनगंगा नदी के तट पर है। पितृ पक्ष के दौरान यहां काफी भीड़ देखने को मिलती है।

लोहागर- यह राजस्थान का प्रसिद्ध तीर्थ स्थान है। यहां श्राद्ध कर्म का विशेष फल मिलता है। जिस व्यक्ति का श्राद्ध यहां किया जाता है, उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस तीर्थ की रक्षा स्वयं ब्रह्माजी करते हैं।

कहते हैं श्राद्ध करने से पितृ ऋण से मुक्ति मिलती है। यह भी मान्यता है कि तृप्त हुए पितर के आशीष से ही परिवार में अच्छी संतान और घर में खुशहाली आती है।