सोनपुर मेला–एशिया के इस सबसे बड़े मेले में बिकते हैं सुई से लेकर हाथी

बिहार के सारण जिले के सोनपुर में हर साल कार्तिक पूर्णिमा पर विश्व प्रसिद्ध सोनपुर मेले का आयोजन किया जाता है। मोक्षदायिनी मां गंगा और गंडक नदी के संगम पर लगने वाले इस ऐतिहासिक मेले में श्रद्धा का सैलाब उमड़ता हैं। देश-विदेश से लाखों की संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक सोनपुर मेले में पहुंचते हैं। सोनपुर मेला एशिया का सबसे बड़ा पशु मेला है, लेकिन यहां सुई से लेकर हाथी तक बिकते हैं।

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सोनपुर मेले का इतिहास कई दशकों पुराना है। मान्यता है कि सोनपुर मेले की शुरुआत मौर्य काल के समय हुई थी। माना जाता है कि चंद्रगुप्त मौर्य भी यहां हाथी खरीदने के लिए आया करते थे। स्थानीय लोगों का मानना है कि 1857 की क्रांति के समय भी बाबू वीर कुंवर सिंह ने यहीं से अरबी घोड़े, हाथी और हथियारों का संग्रह किया था। किसी समय ईरान, अफगानिस्तान और इराक जैसे देशों से भी लोग सोनपुर मेले में पशुओं की खरीदारी करने के लिए आते थे।

वहीं अगर पौराणिक महत्व की बात करें तो इस स्थल को ‘गजेंद्र मोक्ष स्थल’ के नाम भी जाना जाता है। मान्यता है कि एक बार भगवान विष्णु के दो भक्तों ने हाथी और मगरमच्छ के रूप में धरती पर जन्म लिया। एक बार जब हाथी पानी पीने के लिए नदी के तट पर आया तो मगरमच्छ ने उस पर हमला कर दिया। इससे हाथी और मगरमच्छ के बीच भयानक युद्ध छिड़ गया। कई दिनों तक दोनों के बीच युद्ध चलता रहा। अंत में जब हाथी कमजोर पड़ने लगा तो उसने भगवान विष्णु से सहायता मांगी। भगवान विष्णु ने कार्तिक पूर्णिमा के दिन सुदर्शन चक्र चलाकर इस युद्ध का अंत कर दिया। कहते हैं कि दो जानवरों के बीच युद्ध होने के कारण ही यहां से पशु की खरीदारी करना शुभ होता है।

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इस स्थान पर भगवान विष्णु और भगवान शिव का मंदिर है। यहां रोजाना बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। खासकर सोनपुर मेले के दौरान यहां विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। मंदिर को लेकर मान्यता है कि प्रभु श्रीराम ने सीता स्वयंवर में जाते समय स्वयं इनका निर्माण किया था।