जहां पड़े भगवान राम के चरण-जहां ताड़का का अंत हुआ वही स्थान है आज बक्सर

भगवान श्रीराम अपने भाइयों के साथ जब महर्षि वशिष्ठ के आश्रम से शिक्षा ग्रहण कर वापस अयोध्या अपने राजमहल पहुंचे, तो कुछ दिन बाद ही ब्रह्मर्षि विश्वामित्र उन्हें अपने साथ ले जाने के लिए राजा दशरथ से मिलने पहुंच गए। कारण स्पष्ट था भगवान श्रीराम का अवतार महलों में रहने के लिए नहीं बल्कि जन कल्याण और संसार में शांति की स्थापना के लिए हुआ था। ब्रह्मर्षि विश्वामित्र को पता था कि भविष्य में क्या होने वाला है, इसीलिए वे राम- लक्ष्मण को राजा दशरथ से मांगकर कुछ दिनों के लिए अपने साथ ले गए थे। इस तरह भगवान श्रीराम जन कल्याण के लिए पहली बार अपने राजमहल से बाहर निकले थे। आज भी ऐसे स्थान हैं, जहां भगवान राम के वहां पहुंचने के सबूत मिलते हैं।

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जैसा कि सब जानते हैं विश्वामित्र क्षत्रिय वंश में पैदा हुए थे, लेकिन उन्होंने कठोर तपस्या करके ब्रह्मर्षि का पद प्राप्त किया था। विश्वामित्र ब्रह्म ज्ञानी थे। वे काम, क्रोध, मद, लोभ को पूरी तरह जीत चुके थे। वे यज्ञ किया करते थे, क्योंकि सनातन धर्म में यज्ञ करना वैदिक विधान है। उस काल में ऋषि-मुनियों के यज्ञ में राक्षस बाधा डाला करते थे और यज्ञ वेदी भी नष्ट कर देते थे। ब्रह्मर्षि होने के कारण वे किसी की हत्या नहीं कर सकते थे। उन्हें मालूम हो चुका था कि भगवान विष्णु का रामावतार राजा दशरथ के घर में हो चुका है। इसीलिए वे अयोध्या जाकर यज्ञ की रक्षा करने के लिए भगवान राम और उनके छोटे भाई लक्ष्मण को कुछ दिनों के लिए अपने साथ ले आए थे। ब्रह्मर्षि जानते थे कि राम का महाबली राक्षसराज रावण से सामना होगा, इसीलिए उन्होंने राम और लक्ष्मण को हर प्रकार के दिव्य अस्त्रों का ज्ञान देकर उन्हें युद्ध में अजेय बना दिया था।

जब भगवान राम और लक्ष्मण विश्वामित्र के साथ उनके यज्ञ की रक्षा के लिए मौजूद थे। तब राक्षसी ताड़का वहां पहुंच गई और यज्ञ नष्ट करने का प्रयास किया। इसके बाद भगवान राम ने ताड़का का अंत कर दिया था। भगवान राम ने जब उस पर बिना फल का बाण चलाया तो वह कई किलोमीटर दूर जाकर गिरी थी। वह स्थान आज भी मौजूद है, जहां विश्वामित्रजी ने यज्ञ किया था। अब यह बिहार प्रदेश के अंतर्गत बक्सर क्षेत्र कहलाता है। राज ऋषि होते हुए भी विश्वामित्र को गुरुवर वशिष्ठ ने ब्रह्मर्षि की उपाधि दी थी। बक्सर उनका कार्य स्थल रहा है और यहीं वे जप-तप, यज्ञ, योग आदि किया करते थे।

ऋषि विश्वामित्र सहित अस्सी हजार संतों का पवित्र आश्रम पवित्र गंगा नदी के किनारे स्थित था जो आज के जिला बक्सर में ही है। ऋषियों-मुनियों की तपस्या स्थली होने के कारण ही पुराने समय में बक्सर का नाम सिद्धाश्रम पड़ा था। बक्सर ही वह पुण्य भूमि है, जहां विश्व के प्रथम तत्वदर्शी, वैज्ञानिक, मंत्रदृष्टा महर्षि विश्वामित्र ने अपना आश्रम बनाया था। ब्रह्मर्षि विश्वामित्र भारत की प्रचलित व्यवस्था के विरुद्ध क्रांतिकारी कदम उठाने वाले पहले व्यक्ति तो थे ही, उनके द्वारा स्थापित सिद्धाश्रम विश्व का पहला शैक्षणिक संस्थान भी था। उन्हीं के तप- बल के प्रभाव से प्रभु श्रीराम और लक्ष्मण को शस्त्रनीति, धर्मनीति, कर्मनीति व राजनीति का विशेष ज्ञान प्राप्त हुआ। यहां दोनों भाइयों ने मिलकर राक्षस वृत्ति के अंत की शुरुआत कर दी थी। अगर देखा जाए तो मानवीय आदर्शों के कीर्तिमान के रूप में भगवान श्रीराम ने यहीं से रामराज की स्थापना की नींव भी रख दी थी।

ब्रह्मर्षि विश्वामित्र व भगवान श्रीराम से जुड़े होने के बावजूद बक्सर को अभी पर्यटन मानचित्र पर नहीं लाया जा सका है। वैसे रामायण काल से जुड़े तथ्यों के आधार पर यहां कई परंपराओं का निर्वहन आज भी आस्था पूर्वक किया जाता है। इनमें पंचकोश परिक्रमा और सिय-पिय मिलन समारोह आदि भव्य आयोजन हैं, जिनमें देशभर के लाखों श्रद्धालु आकर शामिल होते हैं।